• 30/08/2025

नीच, कुत्ता, चोर, नाली का कीड़ा, मौत का सौदागर… अब मोदी मा**#&%, गालियों की लंबी फेहरिस्त और कांग्रेस की शिकस्त; क्या बिहार में भी सेल्फ गोल हो गया?

नीच, कुत्ता, चोर, नाली का कीड़ा, मौत का सौदागर… अब मोदी मा**#&%, गालियों की लंबी फेहरिस्त और कांग्रेस की शिकस्त; क्या बिहार में भी सेल्फ गोल हो गया?
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक तीन महीने पहले दरभंगा में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मां की गाली दी गई है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह कांग्रेस, आरजेडी और अन्य दलों के महागठबंधन के लिए सेल्फ गोल तो साबित नहीं होगा? क्या यह मामला बिहार के सियासत का टर्निंग प्वाइंट साबित होगा?

यह सारे सवाल इसलिए भी क्योंकि जब-जब मोदी के लिए विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा अपशब्दों का प्रयोग किया गया है, तब-तब यह बीजेपी के लिए फायदेमंद रहा है। बीजेपी ने मोदी के खिलाफ उपयोग किए गए अपशब्दों को चुनावों में जमकर भुनाया है।

भस्मासुर, गंगू तेली, वायरस, अनपढ़-गंवार, बंदर, टुकड़े-टुकड़े करना, नमक-हराम– पीएम पद की रेस में शामिल होते ही कांग्रेस नेताओं ने साल 2013 में मोदी के लिए अपशब्दों की झड़ी लगा दी थी। जयराम रमेश ने उन्हें भस्मासुर बताते हुए कहा था कि वो लालकृष्ण आडवाणी को खा गए। गुलाम नबी आजाद ने उन्हें गंगू तेली कहा था। रेणुका चौधरी ने वायरस कहा था। इमरान मसूद ने तो सारी हदें पार करते हुए मोदी के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कही थी। साल 2018 में संजय निरुपम ने मोदी को अनपढ़-गंवार कहा तो जिग्नेश मेवाणी ने उनको नमक हराम बताया था।

मोदी के खिलाफ अपशब्दों का इतिहास और चुनावी नतीजे

2007, गुजरात विधानसभा चुनाव: सोनिया गांधी ने मोदी को “मौत का सौदागर” कहा। नतीजा बीजेपी ने 117 सीटों के साथ सरकार बनाई, हालांकि 10 सीटें कम हुईं।

 2013, लोकसभा चुनाव से पहले: केंद्रीय मंत्री रहे कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने मोदी को “पागल कुत्ता” कहा। 2014 में बीजेपी ने 282 और NDA ने 336 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई।

2014, लोकसभा चुनाव: मणिशंकर अय्यर ने मोदी के चाय बेचने के बैकग्राउंड का मजाक उड़ाते हुए कहा, “चाय वितरण के लिए जगह बना देंगे।” बीजेपी ने इसे ‘चाय पर चर्चा’ अभियान में बदला और प्रचंड जीत हासिल की।

 2017, गुजरात विधानसभा चुनाव: मणिशंकर अय्यर ने मोदी को “नीच किस्म का आदमी” कहा। बीजेपी ने 99 सीटों के साथ सरकार बनाई।

2019, लोकसभा चुनाव: राहुल गांधी के “चौकीदार चोर है” नारे के जवाब में बीजेपी ने “मैं भी चौकीदार” अभियान चलाया। बीजेपी ने 303 सीटें जीतीं। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने 2019 में लोकसभा में पीएम मोदी की तुलना नाली से की थी, जिसे सदन की कार्यवाही से निकाल दिया गया था

 2023, कर्नाटक विधानसभा चुनाव: मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी को “जहरीला सांप” कहा। यह अपवाद रहा, जहां कांग्रेस ने जीत हासिल की।

2009 : कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद  में मोदी को “गंदी नाली का कीड़ा” कहा था, उस दौरान वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि मोदी के खिलाफ अपशब्दों ने ज्यादातर बीजेपी को मजबूत किया और विपक्ष को नुकसान पहुंचाया

महागठबंधन की रणनीति और ‘वोट चोर’ का नारा

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का उद्देश्य विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम कटने के मुद्दे को उठाना है। राहुल गांधी ने इसे “वोट चोरी” करार देते हुए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर निशाना साधा। हालांकि, दरभंगा की घटना ने इस अभियान को विवादों में ला दिया। बीजेपी ने इसे महागठबंधन की हताशा और नीच राजनीति का प्रतीक बताया।

 चुनावी टर्निंग प्वाइंट?

बिहार में 243 सीटों के लिए अक्टूबर-नवंबर 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव में NDA (बीजेपी और JDU) और महागठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला है। वर्तमान में NDA के पास 137 सीटें हैं, जबकि महागठबंधन के पास 106 सीटें। बीजेपी इस घटना को “महिलाओं और पिछड़े समाज के अपमान” के रूप में प्रचारित कर रही है, जिससे भावनात्मक मुद्दा बन सकता है। बिहार बीजेपी के प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा, “मोदी की लोकप्रियता से परेशान कांग्रेस अपनी राजनीतिक कब्र खुद खोद रही है।”

वहीं, कांग्रेस और RJD ने दावा किया कि यह व्यक्तिगत हरकत थी, जिसे गठबंधन के आधिकारिक रुख से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन इतिहास बताता है कि मोदी के खिलाफ अपशब्द बीजेपी के लिए हथियार बनते रहे हैं। यदि बीजेपी इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से भुनाती है, तो यह महागठबंधन के लिए बड़ा नुकसान साबित हो सकता है।

दरभंगा की घटना ने बिहार के चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है। बीजेपी इसे महागठबंधन के खिलाफ बड़ा हथियार बना रही है, जबकि कांग्रेस और RJD डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं। यदि इतिहास दोहराया गया, तो यह ‘सेल्फ गोल’ महागठबंधन को भारी पड़ सकता है। बिहार की जनता का मूड और बीजेपी की रणनीति इस प्रकरण को चुनाव का टर्निंग प्वाइंट बना सकती है।

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