• 19/09/2025

हमने भी लड़ी जंग.. ऑपरेशन सिंदूर, गलवान और बालाकोट में शामिल, फिर ये भेदभाव क्यों? सेना की महिला अफसरों ने सुप्रीम में उठाई आवाज

हमने भी लड़ी जंग.. ऑपरेशन सिंदूर, गलवान और बालाकोट में शामिल, फिर ये भेदभाव क्यों? सेना की महिला अफसरों ने सुप्रीम में उठाई आवाज
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शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला आर्मी ऑफिसर्स को स्थाई कमीशन देने में भेदभाव बरतने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। महिला अफसरों ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि गलवान, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर जैसे महत्वपूर्ण अभियानों में हिस्सा लेने के बावजूद उन्हें पुरुष अधिकारियों की तुलना में स्थाई कमीशन के लिए भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।

जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्तिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सेवारत और सेवामुक्त महिला अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2020 और 2021 के निर्देशों का बार-बार उल्लंघन किया है। सीनियर एडवोकेट वी मोहना ने कुछ अधिकारियों की ओर से दलील देते हुए कहा, “सरकार ने कोर्ट के परमादेश का उल्लंघन किया और महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन देने में भेदभाव किया।”

उन्होंने बताया कि सरकार ने खाली पदों की कमी का हवाला दिया, लेकिन 2021 के बाद कई बार 250 अधिकारियों की सीमा का उल्लंघन हुआ। मोहना ने जोर देकर कहा, “ये महिला अधिकारी अत्यंत प्रतिभाशाली हैं। इन्होंने गलवान, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और प्रतिकूल क्षेत्रों में पुरुष अधिकारियों के बराबर सेवाएं दीं।”

मामले में अन्य महिला अधिकारियों का पक्ष सीनियर एडवोकेट विभा दत्ता मखीजा, अभिनव मुखर्जी, रेखा पल्ली और अन्य वकीलों ने रखा। महिला अधिकारियों की दलीलें पूरी हो चुकी हैं, और अब केंद्र सरकार 24 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखेगी। केंद्र का प्रतिनिधित्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी करेंगी।

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्थाई कमीशन में भेदभाव पर नाराजगी जताते हुए सवाल किया था कि जब महिला और पुरुष अधिकारियों की ट्रेनिंग और पोस्टिंग समान है, तो स्थाई कमीशन में अलग-अलग मानदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा, “लिंग के आधार पर दो मानदंड कैसे हो सकते हैं? क्या शॉर्ट सर्विस कमीशन और परमानेंट कमीशन के लिए अलग-अलग फॉर्मेट तय किए गए हैं?”

यह मामला सैन्य बलों में लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, और अगली सुनवाई में केंद्र के जवाब पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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