• 26/12/2025

वरिष्ठता को दरकिनार कर जूनियर शिक्षक को दिया प्रमोशन, हाई कोर्ट ने किया आदेश निरस्त

वरिष्ठता को दरकिनार कर जूनियर शिक्षक को दिया प्रमोशन, हाई कोर्ट ने किया आदेश निरस्त
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बिलासपुर। एक शिक्षक द्वारा स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा नियम विरुद्ध किए गए पदोन्नति को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश को निरस्त कर दिया है। हाई कोर्ट ने साफ कहा कि सेवा नियमों का अवहेलना कर किसी पात्र कर्मचारी को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को विभाग के समक्ष अभ्यावेदन पेश करने व राज्य सरकार को भर्ती एवं पदोन्नति नियम 2008 के अनुसार तीन महीने के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया है।

याचिकाकर्ता दिनेश कुमार राठौर अधिवक्ता जितेन्द्र पाली, अनिकेत वर्मा के जरिए बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता की प्रारंभिक नियुक्ति 26 अप्रैल 1989 को निम्न वर्ग शिक्षक के पद पर हुई थी। 2 फरवरी 2009 को उच्च वर्ग शिक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया। 23 जनवरी 2015 को एक आदेश जारी कर डीईओ ने 18 अगस्त 2008 से उनको वरिष्ठता प्रदान की। याचिका के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग के नियमों व मापदंड के अनुसार पांच वर्ष की सेवा पूर्ण कर ली थी और वह व्याख्याता (लेक्चरर) पद पर पदोन्नति के लिए पात्र था।

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में नियमों का हवाला देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा राजपत्रित सेवा (स्कूल स्तर सेवा) भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के अनुसार व्याख्याता का पद 100 प्रतिशत पदोन्नति द्वारा उच्च वर्ग शिक्षकों से भरा जाना है। इसके बावजूद विभागीय पदोन्नति समिति द्वारा 19 जून 2012 को जारी पदोन्नति आदेश में उससे कनिष्ठ शिक्षकों को पदोन्नति दे दी गई। विभागीय अफसरों ने उसके मामले पर विचार नहीं किया। उसका दावा इस आधार पर खारिज कर दिया कि, 1 अप्रैल 2010 की स्थिति में उसके पास स्नातकोत्तर डिग्री नहीं थी।

याचिकाकर्ता ने बताया कि विभागीय अधिकारियों ने जानबूझकर उसके नाम पर पदोन्नति के लिए विचार ही नहीं किया 16 अप्रैल 2012 को स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर ली थी। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय जायसवाल के सिंगल बेंच में हुई। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग सहित अन्य अफसरों को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने का निर्देश दिया था। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने 16 सितम्बर 2016 के आदेश जिसमें याचिकाकर्ता को स्नातकोत्तर उपाधि नहीं होने के कारण पदोन्नति हेतु पात्र नहीं माना गया था, राज्य शासन के इस आदेश को निरस्त कर दिया है। याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपनी समस्त मांगों के साथ अभ्यावेदन प्रस्तुत करें तथा सक्षम प्राधिकारी को 90 दिनों के भीतर भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

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