• 15/03/2023

मडिक्लेम के लिए मरीज का अस्पताल में भर्ती रहना जरुरी नहीं, कंज्यूमर कोर्ट का बड़ा फैसला

मडिक्लेम के लिए मरीज का अस्पताल में भर्ती रहना जरुरी नहीं, कंज्यूमर कोर्ट का बड़ा फैसला
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मेडिक्लेम को लेकर उपभोक्ता फोरम का बड़ा फैसला सामने आया है। कोर्ट ने कहा कि मेडिक्लेम के लिए किसी भी व्यक्ति का 24 घंटे तक अस्पताल में रहना जरुरी नहीं है। वड़ोदरा की कंज्यूमर फोरम ने एक मामले में बीमा कंपनी को मेडिक्लेम की राशि भुगतान करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि नई तकनीक आने की  वजह से मरीज का इलाज कम समय में या फिर अस्पताल में भर्ती हुए बिना भी किया जाता है।

वड़ोदरा के रहने वाले रमेश चंद्र जोशी ने साल 2017 में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया था। जोशी में फोरम में दायर अपनी याचिका में कहा था कि उनकी पत्नी साल 2016 में डर्मेटोमायोसिटिस से पीड़ित थी और अहमदाबाद के लाइफ केयर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर में उन्हें भर्ती कराया गया था। इलाज के बाद अगले दिन उन्हें छुट्टी दे दी गई।

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जोशी ने 44,468 रुपये का क्लेम किया। बीमा कंपनी ने उनके क्लेम को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पॉलिसी नियम के मुताबिक उन्हें 24 घंटे तक भर्ती नहीं किया गया था। जोशी ने फोरम में दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए कहा कि उकी पत्नी 24 नवंबर 2016 की शाम कोअस्पताल में भर्ती हुई थीं और उन्हें 25 नवंबर की शाम को 6ः30 बजे डिस्चार्ज किया गया। जो कि 24 घंटे से ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती थी।

फोरम ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भले ही यह माना जाए कि मरीज अस्पताल में 24 घंटे से कम समय के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था लेकिन उसे क्लेम का भुगतान किया जाना चाहिए। आधुनिक समय में इलाज की नई-नई तकनीक आने से डॉक्टर उसी के अनुसार इलाज करता है। जिससे समय कम लगता है। पहले मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था। अब कई बार तो मरीजों को बिना भर्ती किए ही इलाज कर दिया जाता है। फोरम ने कहा कि बीमा कंपनी यह कहकर क्लेम देने से इनकार नहीं कर सकती है कि मरीज को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया।

फोरम ने कहा कि बीमा कंपनी यह तय नहीं कर सकती है कि रोगी को अस्पताल में भर्ती करना आवश्यक है या नहीं। केवल डॉक्टर ही नई तकनीक, दवाओं और मरीज की स्थिति के आधार पर निर्णय ले सकते हैं। फोरम ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि दावा खारिज होने की तारीख से 9% ब्याज के साथ जोशी को 44,468 रुपये का भुगतान किया जाए। इसके साथ ही बीमाकर्ता को मानसिक उत्पीड़न के लिए 3,000 रुपये और जोशी को मुकदमे के खर्च के लिए 2,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया गया था।

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