- 25/08/2025
आदिवासी विकास विभाग में बड़ा टेंडर घोटाला, दो पूर्व अधिकारी गिरफ्तार, एक बाबू फरार

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में आदिवासी विकास विभाग से जुड़ा एक बड़ा फर्जी टेंडर घोटाला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने दो पूर्व सहायक आयुक्तों को गिरफ्तार किया है। जबकि बाबू फरार हो गया। पुलिस उसकी तलाश में जुटी है। घोटाले के तार 2021 से अब तक के 45 फर्जी टेंडरों से जुड़े हैं, जो ठेकेदारों के साथ मिलीभगत कर गोपनीय तरीके से जारी किए गए।

जगदलपुर और रायपुर से हुई गिरफ्तारी
गिरफ्तार किए गए अफसरों का नाम पूर्व सहायक आयुक्त डॉ. आनंदजी सिंह और रिटायर्ड सहायक आयुक्त केएस मसराम है। फरार आरोपी का नाम संजय कोड़ोपी है।
पुलिस के मुताबिक, डॉ. आनंदजी सिंह को जगदलपुर और केएस मसराम को रायपुर से गिरफ्तार किया गया। दोनों अधिकारी पहले दंतेवाड़ा में आदिवासी विकास विभाग में कार्यरत रह चुके हैं। मामले की शिकायत के बाद कलेक्टर कुणाल दुदावत ने जांच के आदेश दिए थे, जिसके बाद यह सनसनीखेज खुलासा हुआ।

कलेक्टर की जांच में खुला घोटाले का राज
शिकायत मिलने पर कलेक्टर कुणाल दुदावत ने गहन जांच शुरू की। जांच में सामने आया कि वर्षों से विभाग में नियमों को ताक पर रखकर चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए फर्जी निविदाएं तैयार की जा रही थीं। ये टेंडर बिना किसी सार्वजनिक सूचना या पारदर्शी प्रक्रिया के, फाइलों में हेरफेर और रिकॉर्ड में गड़बड़ी कर जारी किए गए। विकास कार्यों को कागजों पर दिखाकर बजट की हेराफेरी की गई।
पुलिस ने दर्ज की FIR, कार्रवाई शुरू
वर्तमान सहायक आयुक्त राजू कुमार नाग ने दंतेवाड़ा सिटी कोतवाली में लिखित शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2) और 61(2) के तहत एफआईआर दर्ज की। इसके बाद त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस ने दोनों पूर्व अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। फरार बाबू संजय कोड़ोपी की तलाश में छापेमारी जारी है।
45 फर्जी टेंडर उजागर, और खुलासे की संभावना
जांच में अब तक 45 फर्जी टेंडरों में गड़बड़ी सामने आई है। कई निर्माण कार्यों की फाइलें अभी भी जांच के दायरे में हैं, और माना जा रहा है कि इस घोटाले में और भी अधिकारियों और ठेकेदारों की संलिप्तता उजागर हो सकती है। पुलिस और प्रशासन ठेकेदारों की भूमिका की भी गहन जांच कर रहे हैं।
घोटाले का तरीका
जांच में पाया गया कि घोटाला सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। टेंडर प्रक्रिया को गोपनीय रखा जाता था, और नियमानुसार निविदाओं का प्रकाशन या संवाद नहीं किया जाता था। पसंदीदा ठेकेदारों को ठेका देने के लिए फाइलों में हेरफेर किया जाता था। विकास कार्यों को कागजों पर पूरा दिखाकर बजट का दुरुपयोग किया गया।





