• 07/06/2026

जल संरक्षण का महाअभियान: मनरेगा से गांवों में बढ़ रहा जल भंडार, हरियाली और आजीविका

जल संरक्षण का महाअभियान: मनरेगा से गांवों में बढ़ रहा जल भंडार, हरियाली और आजीविका
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00 मोर गांव-मोर पानी अभियान से जल संरक्षण बना जनआंदोलन, रोजगार और ग्रामीण समृद्धि को मिली नई गति
रायपुर। जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित वर्षा और बढ़ते जल संकट के बीच छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण को लेकर एक व्यापक जनअभियान आकार ले रहा है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत संचालित मोर गांव-मोर पानी महाअभियान के माध्यम से प्रदेशभर में जल संरक्षण, रोजगार सृजन, हरित विकास और आजीविका संवर्धन को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। जल संरक्षण अब केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह जनभागीदारी से संचालित एक व्यापक सामाजिक पहल के रूप में विकसित हो रहा है।

अभियान के अंतर्गत प्रदेश में लगभग 1610 करोड़ रुपये की लागत से एक लाख से अधिक जल संरक्षण एवं संवर्धन कार्यों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें तालाब, डबरियां, चेकडैम, जल संवर्धन संरचनाएं, स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच, खेत तालाब और अन्य जल संरक्षण कार्य शामिल हैं। इन परिसंपत्तियों का उद्देश्य वर्षा जल को अधिकतम मात्रा में भूमि में रोकना, भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता को सुदृढ़ करना है। इन कार्यों के माध्यम से प्रदेश में प्रतिदिन 11 लाख से अधिक श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध हो रहा है, जिनमें 57 प्रतिशत महिलाएं हैं। इस प्रकार जल संरक्षण का यह अभियान प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम भी बन रहा है।
जल संरक्षण से आजीविका का सृजन
राज्य सरकार ने जल संरक्षण को सीधे ग्रामीण आजीविका से जोडऩे की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। समाज के संवेदनशील और कमजोर वर्गों की निजी भूमि पर 13,065 आजीविका डबरियों का निर्माण पूर्ण किया जा चुका है। इन परिसंपत्तियों के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को मत्स्य पालन, बागवानी, सब्जी उत्पादन और अन्य आयवर्धक गतिविधियों के अवसर मिल रहे हैं। इसी प्रकार नवा तरिया-आय के जरिया पहल के अंतर्गत 624 सामुदायिक तालाब विकसित किए जा रहे हैं। इन जल संरचनाओं को स्वयं सहायता समूहों, विशेषकर महिला समूहों की आजीविका से जोडऩे की पहल की गई है, जिससे जल संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का एक प्रभावी मॉडल विकसित हो रहा है।

पहाडिय़ों पर ट्रेंच, मैदानों में जल संचयन
प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में ढलान और पहाड़ी भूभागों पर स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच (स्ष्टञ्ज) का निर्माण किया जा रहा है। ये संरचनाएं वर्षा जल के तेज बहाव को रोककर उसे भूमि में समाहित होने का अवसर देती हैं। इससे मिट्टी का कटाव कम होता है, भू-जल स्तर में सुधार होता है और वृक्षारोपण को आवश्यक नमी उपलब्ध होती है। जल संरक्षण और वृक्षारोपण के इस समन्वित प्रयास से हरित आवरण में वृद्धि हो रही है तथा पर्यावरणीय संतुलन को मजबूती मिल रही है।
तकनीक से जल संरक्षण को नई दिशा
मोर गांव-मोर पानी अभियान की एक प्रमुख विशेषता आधुनिक तकनीकों का उपयोग है। कार्यों की वैज्ञानिक योजना और गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन के लिए त्रढ्ढस् आधारित युक्तधारा प्लानिंग, सीएलएआरटी एप तथा वाटरशेड सिद्धांतों का उपयोग किया जा रहा है। भू-जल स्तर की निगरानी के लिए जलदूत प्रणाली लागू की गई है, जिसके माध्यम से खुले कुओं के जल स्तर का नियमित मापन किया जा रहा है। ग्राम पंचायत स्तर पर जल स्तर की जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित कर जल बजट तैयार करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है।
पारदर्शिता और जनभागीदारी का मॉडल
मनरेगा के क्रियान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में क्यूआर कोड आधारित सूचना प्रणाली विकसित की गई है। इसके माध्यम से ग्रामीण अपने गांव में स्वीकृत और पूर्ण कार्यों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। रोजगार दिवस, आवास दिवस, सामाजिक अंकेक्षण और जनसंवाद कार्यक्रमों के माध्यम से भी लोगों की भागीदारी और निगरानी को बढ़ावा दिया जा रहा है।

भागीदारी से साझेदारी की ओर
जनप्रतिनिधियों, पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, युवाओं, सामाजिक संगठनों और ग्रामीण समुदाय की सक्रिय भागीदारी से जल संरक्षण का यह अभियान जनआंदोलन का रूप ले चुका है। ग्राम सभाओं, जागरूकता अभियानों और सामुदायिक प्रयासों के माध्यम से जल संरक्षण को लोगों के दैनिक व्यवहार का हिस्सा बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ का मोर गांव-मोर पानी अभियान आज यह दिखा रहा है कि जल संरक्षण, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, तकनीकी नवाचार और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़कर ग्रामीण विकास का एक स्थायी और समावेशी मॉडल विकसित किया जा सकता है। यह अभियान केवल पानी बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि गांवों में समृद्धि, आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय संतुलन की नई नींव रख रहा है।

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